काश मैं चिड़िया होती



काश मैं चिड़िया होती ,उडती ऊंची खूब आकाश ,लेकिन,

मैं तो थी बिटिया ,घर की लाज.

जिस घर में मैंने जन्म लिया ,उस घर को देखा था उस दिन..

छोटा भाई था घर में आया,

खुश थे सभी ,थी सभी के अधरों पे मंद मुस्कान,

मैंने पूछा जब मैं पैदा हुई ,तब??

घरवालों ने बतलाया ,दिख रहे थे सभी के दांत खुले हुए,

मैं इतराई खुद पे ,लेकिन पता नहीं था तब,दांत जितना दिखे,दिखावा उतना होता है..

दुखी हुई मैं,घरवालों के हंसने की मजबूरी पे..:'(

उस दिन सोचा ,मैं खुले में जाके रोऊँ ,पर घर ने बोला ,नहीं,'बिटिया तुम हो घर की लाज'

पढने जाना था मुझे,लेकिन घर ने सोचा,

पराये खाते में पैसा जमा करने जैसा है ,लड़किओं को पढ़iना,

खैर ,मजबूरी में ही सही ,स्कुल भेजी गयी मैं ,ये याद दिला के ,

शाम को जल्दी आ जाना,' बिटिया तुम हो घर की लाज ',


बड़ी हुई जब ,खेलने को भाई क साथ जा रही थी ,घरवालों ने रोका ,बोला

'बिटिया तुम हो घर की लाज'

शादी हुई ,मेरे चेहरे पे जो नुक्सान का निशाँ ,घरवालों को दीखता था,छुटकारा मिला उससे ,

अब दुसरे घर थी आई मैं ,यहाँ मैं बिटिया नहीं,थी,' बहू घर की लाज',

नौकरी की थी मन में ठानी,लेकिन नए घर ने बोला, नहीं 

बहू तुम हो घर की लाज


समय बढ़ा और रफ़्तार से, माँ बन गयी थी मैं,

जिम्मेदारियां और बढ़ गयी थी निभानी मुझको ,आखिर

मैं ही तो थी 'बहू घर की लाज' ,

बुढ़ापा भी नहीं रुका था,आ गया हौले हौले,

बन गयी थी  एक  बोझ मैं ,

मैंने बोला कहीं चली जाती हूँ,पर फिर घर ने बोला,

'अम्मा तुम हो घर की लाज' ,

कारण था की मैं खाली हाथ नहीं थी,

लेनदेन बाकी थी अभी..

अंत समय भी आ गया ,चली गयी इस दुनियां से मैं,

घरवालों ने ज्यादा सोचा नहीं,क्यूंकि अब नहीं रह गयी थी मैं,

घर की लाज..


सवाल कुछ रह गए थे मन में..

बेटा तो घर का होता है न?, फिर मैं ही  क्यूँ थी 'घर की लाज'??

सोचती हूँ इससे अच्छा होता की मैं चिड़िया होती ,उड़ती ऊंची खूब आकाश,,,

न होती कोई सीमा ,न होती मैं ,

कहीं की लाज.....!!

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